अरुण जेटली से साल भर पहले मिलकर सिंधिया ने बीजेपी में जाने की बनायीं थी रणनीति

अरुण जेटली से साल भर पहले मिलकर सिंधिया ने बीजेपी में जाने की बनायीं थी रणनीति
सिंधिया अरुण

कांग्रेस छोड़कर भाजपा के साथ जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के दल बदल की पटकथा पिछले साल अपने निधन से पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली लिख गए थे। लेकिन जेटली की बिगड़ी सेहत और फिर निधन ने सिंधिया के कदम तब रोक दिए थे, और वह सही मौके की तलाश करने लगे थे। राज्यसभा चुनावों ने उन्हें यह मौका दिया और सिंधिया ने जेटली के जमाने में लिखी गई अपने भाजपा प्रवेश की अधूरी पटकथा को अब पूरा कर दिया।हालांकि आखिरी वक्त में कांग्रेस नेतृत्व सिंधिया को मध्यप्रदेश से राज्यसभा में भेजने और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने को तैयार हो गया था, लेकिन सिंधिया की तीसरी बड़ी शर्त कि राज्यसभा की दूसरी सीट पर दिग्विजय सिंह की जगह किसी अन्य ओबीसी नेता को भेजा जाए, को मानने से कांग्रेस नेतृत्व ने इनकार कर दिया। 

गौरतलब है कि पिछले साल अपने टि्वटर हैंडल में अपनी पहचान से कांग्रेस को अलग करके सुर्खियों में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से अपनी बढ़ती दूरी का संकेत दे दिया था। इसके बाद मध्यप्रदेश में पिछले दिनों उनका यह बयान कि अगर वादे पूरे नहीं हुए तो वह सड़कों पर उतरेंगे, बहुत कुछ बता गया था। रही सही कसर मुख्यमंत्री कमलनाथ के इस बयान ने पूरी कर दी कि वह (सिंधिया) सड़कों पर उतरें उन्हें रोका किसने है। 

सिंधिया दरअसल कांग्रेस से निकलने और भाजपा में जाने वाली अपनी सियासी फिल्म की उस पटकथा को पूरा कर रहे थे, जिसे बीते साल अगस्त में उन्होंने भाजपा नेता अरुण जेटली के साथ मिलकर लिखनी शुरु की थी और तभी उनकी भाजपा के साथ खिचड़ी पकनी शुरु हो गई थी अगर तब अरुण जेटली का निधन नहीं हुआ होता तो जो अब हुआ है सिंधिया तभी भाजपा में शामिल होकर केंद्रीय मंत्री बन चुके होते। लेकिन बीच राह में जेटली के पहले अस्पताल चले जाने और फिर दुनिया से चले जाने की वजह से सारा खेल बिगड़ गया।

बताया जाता है कि बीते साल अगस्त में ज्योतिरादित्य सिंधिया एक जाने माने मीडिया घराने की एक शिखर हस्ती के साथ अरुण जेटली से उनके घर पर मिले थे। वहां उस मीडिया मुगल ने जेटली से आग्रह किया कि ज्योति के राजनीतिक भविष्य को लेकर कुछ करें। तब जेटली ने सुझाव दिया कि सिंधिया के पास भाजपा में शामिल होने के सिवा कोई विकल्प नहीं है और उन्हें यह फैसला जल्दी लेना चाहिए। 

तब सिंधिया ने कहा था कि भाजपा अगर उन्हें मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए तो वह कम से कम दो दर्जन विधायकों को साथ लेकर भाजपा में आ सकते हैं। लेकिन जेटली ने कहा था कि सिंधिया को सीधे मुख्यमंत्री बनाना मुमकिन नहीं है क्योंकि भाजपा के मध्यप्रदेश के दिग्गज नेता शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय आदि इसे मंजूर नहीं करेंगे और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इसके लिए एकदम तैयार नहीं होंगे।

जेटली का सुझाव था कि ज्योति पहले भाजपा में शामिल हों और अपने समर्थक विधायकों से इस्तीफा दिलाकर कमलनाथ सरकार गिरवाएं। बदले में भाजपा उन्हें केंद्र में मंत्री बनाकर आगे राज्यसभा में भेज सकती है। सिंधिया इसके लिए तैयार हो गए थे। जेटली ने इस कार्ययोजना को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से बात करने का भरोसा दिया था। 

लेकिन इसके बाद ही जेटली की तबियत और खराब हो गई और उन्हें अस्पताल जाना पड़ा। वहां उनकी हालत बिगड़ती चली गई और फिर कभी नहीं सुधरी। इसके बाद सिंधिया ने अपने कदम रोक लिए औ्रर मौके का इंतजार करने लगे। 

उधर कांग्रेस में एक वक्त ज्योतिरादित्य को पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने का मन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बना लिया था, लेकिन इसी बीच कांग्रेस के कुछ शीर्ष नेताओं को सिंधिया और जेटली की इस सियासी खिचड़ी की खबर लग गई और उन्होंने सोनिया को यह जानकारी दे दी। 

इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व सिंधिया को लेकर सतर्क हो गया। उन्हें तत्काल कोई जिम्मेदारी न देकर इंतजार करने की रणनीति अपनाई गई। अब राज्यसभा चुनाव के वक्त मध्यप्रदेश से दूसरी वरीयता की सीट देने के लिए नेतृत्व राजी था, लेकिन न सिर्फ अपने लिए प्रथम वरीयता की सीट मांग रहे थे, बल्कि उनकी जिद यह भी थी कि दूसरी सीट पर दिग्विजय सिंह की जगह किसी अन्य को लाया जाए। जिसे कांग्रेस नेतृत्व ने मानने से इनकार कर दिया।

गौरतलब है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और अरुण जेटली के बीच बेहद घनिष्ठ रिश्ते थे। दोनों के ये रिश्ते क्रिकेट की सियासत के साथ साथ जेटली और ज्योतिरादित्य के पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के बीच गहरी दोस्ती की वजह से भी थे। साथ ही देश के एक जाने माने मीडिया घराने के मालिक की इन दोनों से गहरी दोस्ती भी इन रिश्तों की एक बड़ी वजह थी।