18/07/2018 12:21:10 AM
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साहित्य

वो और मै :दीप सुधाकर

वो मुझे देखकर हँसते रहे मैं राह अपनी चलता रहा वो राह में रूकावट बनते रहे मैं मंज़िल अपनी ढूंढता रहा। वो इलज़ाम मुझ पर लगते रहे मैं हँस कर सब सहता रहा वो नफ़रत की बीज बोते रहे मैं प्यार का फूल खिलाता रहा। वो मेरी दोस्ती से खेलते रहे मैं उनका खिलौना बनाता रहा वो मेरे भरोसे को ... Read More »

अमानवीय अत्याचार और व्यह्वार पर कोख में पल रहे लड़की की पुकार पर रवि रंजन की कविता.

———–पुकार———- नहीं जीना तेरी गोद में, मौत दे दे तू अपनी ही कोख़ में। तेरी दुनियाँ में न आऊँगी खुद को मज़बूर न पाऊँगी लोगों से पीछा छुड़ाऊँगी अपनों से भी दूर चली जाउंगी। नहीं जीना तेरी गोद में मौत दे दे तू अपनी ही कोख़ में। नहीं जाना मुझे तेरे इस गन्दी सी वास में तू रख ले मुझको ... Read More »

दीप सुधाकर की कविता…पहचान

​शीर्षक- पहचान तुमसे स्नेह की डोर बंधी है मेरी तेरे रंग से जीवन रंगीं है मेरी साथ चलूँगा हर कदम मैं तेरे तू सबसे खास है जीवन में मेरे। तू दिल, जिगर, जां है मेरी हर गीतों की अल्फाज है मेरी जिन्दा रहने को तू सांस है मेरी तेरी हँसी से जिंदगी गुलजार है मेरी। तू आँखों में बसी ख्वाब ... Read More »

युवा पत्रकार दीप सुधाकर की रचना  “माफ़ी”

​शीर्षक- माफ़ी      मजबूर हूँ, मैं मगरूर नहीं पास हूँ, तुमसे दूर नहीं दोस्ती है, तुमसे दुश्मनी नहीं प्यार से बोलूंगा, मानोगी नहीं इसलिए मैसेज किया, फ़ोन नहीं। नज़रें चुराकर चलो, बुरा नहीं दामन बचाकर चलो, बुरा नहीं माफ़ करो न करो, कोई नहीं छोटी भूल थी, बड़ी तो नहीं सज़ा इतनी बड़ी, सही तो नहीं। बात तेरी मानी, ... Read More »

कुछ ऐसे थे ”आज भी खरे हैं तालाब” के अनुपम मिश्र…!…

​आज देश के जाने-माने हिंदी के दिग्गज कवि और लेखक भवानी प्रसाद मिश्र के बेटे अनुपम मिश्र जो की गांधीवादी, पत्रकार, पर्यावरणविद् थे,का दिल्ली के एम्स में निधन हो गया। जिनका अंतिम संस्कार दिल्ली के निगम बोध घाट पर किया गया। 68 बरस के मिश्र एक बरस से प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे थे। बीते 10 दिसंबर को उनकी तबियत ... Read More »

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का 10वां सत्र 19 से 23 जनवरी तक होगा

​जयपुर।देश—विदेश में काफी फेमस हो चुका जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का 10वां सत्र 19 से 23 जनवरी तक होगा। जयपुर में एसएमएस अस्पताल के पास डिग्गी पैलेस में आयोजित होने वाले जेएलएफ में नामी—गिरामी वक्ता हिस्सा लेते हैं। समय समय पर विवादित रहने वाले इस फेस्टिवल में हजारों की संख्या में दर्शक आते हैं। लिटरेचर के संबंध में कार्यक्रम के आयोजकों ... Read More »

चुनाव फिर आ रहा हूं

​ऐ जाति, ऐ धर्म | चल दिखा अपना मर्म | देखता हूँ कौन टिकता है कश्ती में | आग लगाने तुम्हारी हस्ती में | मैं चुनाव फिर आ रहा हूँ तुम्हारी बस्ती में | मेरे पास बहुत मुद्दे हैं, तुम्हे भड़काने को | तुम्हारी रोटी छीन के खाने को | दिखा दूंगा कमबख्त ज़माने को | मैं चुनाव, फिर आ ... Read More »

समय-संवाद….. 

संवाद24 की पहल  वर्तमान ज्वलंत मुद्दे पर परिचर्चा  टीम संवाद24 Read More »

मीनाक्षी जोशी की कविताएँ

  आज के दौर में आज के दौर में पत्थर उन्हीं पर बरसते हैं जो दिमाग नहीं बस शीशे-सा दिल रखते हैं।   गर टकराना है जमाने से तो पत्थर दिल बन जाइए संवेदना और भावना को गंगा में बहा आइये ।   हवा का रुख देख कर राह बदलते जाइए येन-केन प्रकारेण मंज़िल अपनी पाइए   खुश रखना है ... Read More »

नेहा शुक्ला की कविता

ऐ रात! तू इतनी गुमसुम क्यों है? खुद को ज़माने से छुपाये क्यों है? इस अंधकार से डरती क्यों है? ज़रा उठ, बाहर तो निकल, उस चाँद की रौशनी को देख । देख कितने खुश है ये तारे, एक दूसरे से मीलो दूर, फिर भी ये खुश है । देख इस कालेपन में भी शांति है, फिर इस अंधकार से ... Read More »