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अहसास ..एक प्रयास..”न मरने पाए कोई कपड़े की कमी से”

अहसास ..एक प्रयास..”न मरने पाए कोई कपड़े की कमी से”

​गरीबों को ठण्ड से बचाने के लिए एक प्रयास महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों/ शोधार्थियों के द्वारा।

 प्रायः देखने को मिलता है कि ठण्ड के दस्तक देते ही गरीब लोगों के पास गर्म कपड़ों का इंतजाम नही हो पाता और उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। ठंड से मौत हमेशा गरीबों की ही होती है अमीरों की नहीं। शहरों में रिक्शा चलाने वाले लोग अपने रिक्शों में तथा मजदूरी करने गए लोग व भिखारी खुले में सड़क पर रहने को मजबूर होते हैं। आए दिन सैकड़ों लोगों की ठण्ड से मरने की ख़बरें आती रहती हैं। हालांकि मानवीय दृष्टिकोण से सरकारों को ऐसे गरीब लोगों को चिन्हित करके उनके तन पर कपड़ों की व्यवस्था, छत की या अस्थाई टेंटों के इंतज़ाम और अलाव के जरूरी इंतज़ाम करने चाहिए और यदि ठण्ड शुरू होते ही समय रहते लोगों को ऐसी सुविधाएं उपलब्ध करा दी जाएं तो मरने वालों को बचाया जा सकता है। ठण्ड शुरू होते ही सरकारें ऐसी ‘कवायद’ करना शुरू भी कर देती हैं लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि ऐसे लोगों को सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली जरूरी चीजें मिल भी पाती हैं या नहीं। जहां एक तरफ इनके लिए सरकारी प्रयास भी कम किए जाते हैं वहीं पुलिस वाले भी इनको रात-बिरात खदेड़ते रहते हैं। रैन बसेरों में इनके लिए जगह शायद ही उपलब्ध हो पाती है।

यह समस्या एक प्रदेश, एक गाँव या एक शहर की नही है अपितु कमोबेश पूरे देश (विशेष तौर से उत्तर भारत) की है। प्रतिवर्ष हजारों लोग ठण्ड के चलते अपनी जान गँवा देते हैं। सरकारें दावे तो बहुत करती हैं परंतु सर्दियों के मौसम में उनकी कलई खुल ही जाती है। हम सबकी जिम्मेदारी है कि बाहर निकलें और ठण्ड से जूझते ऐसे कमजोर लोगों की मदद करें। देश का नागरिक होने के नाते आप सभी नागरिकों से अपील की जाती है कि ऐसे लोगों की मदद को सामने आएं। यदि ऐसा संभव हो पाया तो शायद कपड़ों की कमी के कारण समय से पहले अपनी जान गंवाने वाले अपने ही भाई-बहन जीवन के कुछ और साल हमारे साथ गुजार पाएंगे।
“अहसास न मरने पाए कोई कपड़े की कमी से” नाम से एक अभियान के रूप में गरीब,बेबश,लाचार लोगों के वर्धा,महाराष्ट्र में एक मुहीम चलाई जा रही है। यदि आप भी देश के जागरूक नागरिक हैं और किसी कारणवश ऐसे लोगों की प्रत्यक्ष/परोक्ष रूप से मदद नही कर पा रहे हैं तो आइए हम आपको ऐसे लोगों के बारे में बताते है, एक मौका देते हैं इस ठिठुरती सर्दी में कपड़ों की कमी के कारण जीवन जीने को अभिशप्त लोगों की मदद करने का। आपको करना बस इतना है कि आपको अपने या अपने परिवार के सदस्यों के पुराने रखे हुए कपड़े, जिन्हें आप पहनना नहीं चाहते, धुलकर सुखाकर हम तक पहुँचाना है। बावजूद इसके झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के पास अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संसाधनों की भारी कमी है। इन संसाधनों जैसे- थैले, चप्पल, जूते, पेन, पुस्तकें, स्टेशनरी, स्कूल बैग, नोटबुक, पेंसिल, रबर आदि के लिए आर्थिक रूप से सक्षम न होने के कारण समाज में इन लोगों का स्थान निम्नतर दिखता है। इन निम्न वर्गों को इन संसाधनों को मुहैया कराकर आप सभी उनका सहयोग कर सकते हैं। आपके द्वारा दिए गए इन संसाधनों को जरूरतमंदों तक पहुंचाया जायेगा।
समाज के हित के लिए कार्य करने और सोचने वाले ये लोग पिछले वर्ष 2015 में भी ठण्ड के मौसम में ये अभियान चलाया था और सफलतापूर्वक इस अभियान के तहत कई गरीब के तन को ढकने के लिए कपड़े प्रदान किए।

सहायता प्रदान के लिए आप इनसे संपर्क भी कर सकते हैं-

नरेंद्र दिवाकर – 8007840251नरेश -8007840158 यदुवंश – 9822177969गजानन निलामें- 9579587288डिसेंट- 9604272869

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