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चंद सवाल देश के मुखिया से:अमित मिश्रा

चंद सवाल देश के मुखिया से:अमित मिश्रा

​विदेशों से लेकर, हर बड़े मुद्दे पर माननीय प्रधानमंत्री का ट्वीट आता है लेकिन देश के अंदर की कुछ ऐसी चीज है जिसका इंतजार आम जनता को होता है कि आप कुछ करेंगे, कुछ बोलेंगे तब आप खामोश हो जाते हो इस खामोशी के क्या मायने, ऐसी चीजों से गरीब, किसान और जवान का हौसला टूटता है 

इंतजार तुम्हारे ट्विट का तब भी था जब मंदसौर में किसानों पर गोलियां चलाई जा रही थी. तुम मौन थे खामोश थी या यूं कहें कि जानबूझकर चुप थे. आज पुराने बिछड़े साथी को पाकर बहुत खुश हो सोशल मीडिया में ट्वीट पर ट्वीट किए जा रहे हो खुशी होनी भी चाहिए नीतीश कुमार की घर वापसी जो हुई है.

और कुछ चंद सवाल मन को कचोटते हैं

 किसी मां को अपने बेटे के घर लौटने का इंतजार था?

किसी बहन को अपने भाई के चौखट पर दस्तक देने का इंतजार था?

किसी मासूम को उसके पिता से बहुत से सवाल पूछने का इंतजार था?

बूढ़े पिता को अपने बेटे को देखने का इंतजार था?

घुंघट डाले एक पत्नी अपने पति की राह तकते तकते थक गई उसे भी इंतजार था?

सवाल मध्य प्रदेश के मंदसौर में या महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या पुलिस की बर्बरता, प्रशासन की लचर व्यवस्था और फिर उसके साथ सीमा पर जवानों की शहादत का है. 

इस देश की जनता बहुत भावुक है उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचती है जब उसका विश्वास टूटता है. 2014 मैं सरकार बनने के बाद देश बहुत उम्मीदों से देख रहा था और इस उम्मीद में था की देश का प्रधानमंत्री हर दुख सुख में जनता के साथ खड़ा रहेगा, नोटबंदी जैसे कड़े फैसलों में देश नेतृत्व के साथ खड़ा रहा उसे विश्वास था उसका विश्वास नहीं टूटेगा, सीमा पर जवानों की मौत पर हर बार वह उम्मीद की किरण लिए खड़ा तुम्हारे आश्वासन  में शहीद के परिवार के सारे आंसू सूख गए लेकिन आज तक सीमा पर शहादत नहीं रुकी .हर रोज किसी एक घर का चिराग बुझ जाता है और तुम खामोश रहते हो .

विपक्ष को कोसते उन्हें दोष देते 3 साल बीत चुके लेकिन सही मायने में न किसान को उसका हक मिला न जवानों की शहादत रुकी . आज बिहार में बिछड़े साथी को पाकर मुखिया तुम खुश हो लेकिन वह बूढ़ी आंखें थक चुकी हैं जिन्होंने अपनों को खोया है .

   चंद सवाल है जहन में जिनका जवाब मांगता हूं     कलम के भरोसे देश के आम आदमी का हक मांगता     हूं।।

लेखक:अमित मिश्रा “ग़ुलाम”

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