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अयोध्या मामला: सुप्रीम कोर्ट में 11 अगस्त से शुरू होगी सुनवाई

अयोध्या मामला: सुप्रीम कोर्ट में 11 अगस्त से शुरू होगी सुनवाई

राम जन्मभूमि विवाद मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने विशेष पीठ का गठन कर दिया है। शुक्रवार को तीन न्यायाधीशों की विशेष पीठ मामले पर सुनवाई करेगी। भगवान श्री रामलला विराजमान सहित सभी पक्षों ने राम जन्मभूमि को तीन बराबर हिस्सों में बांटने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 30 सितंबर 2010 को दो एक के बहुमत से फैसला सुनाते हुए राम जन्मभूमि को तीन बराबर हिस्सों में राम लला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेट्रल वक्फ बोर्ड मे बांटने का आदेश दिया था। सभी पक्षों ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल अपीलें विचारार्थ स्वीकार करते हुए 9 मई 2011 को हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। साथ ही कहा था कि मामला लंबित रहने तक संबंधित पक्षकार विवादित भूमि पर यथास्थिति बनाए रखेंगे।

गत मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने वेबसाइट पर नोटिस जारी कर 11 अगस्त को दोपहर दो बजे तीन न्यायाधीशों की विशेष पीठ के मामले पर सुनवाई करने की जानकारी दी है। ये पहला मौका है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि विवाद की सुनवाई के लिए तीन न्यायाधीशों की विशेष पीठ का गठन किया है। शुक्रवार से इस मामले पर नियमित सुनवाई होगी या फिर अंतरिम राहत आदि मांगने वाली अर्जियों पर विचार होगा ये बात उसी दिन स्पष्ट हो पाएगी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के नोटिस में यह बात स्पष्ट नहीं है और न ही संबंधित पक्षकारों को कोर्ट रजिस्ट्री की ओर से अलग से कोई ऐसी सूचना दी गई है। इस बीच सुब्रमण्यम स्वामी ने जरूर एक अर्जी दाखिल कर पूजा अर्चना का हक मांगा है और अपनी अर्जी पर स्वयं बहस करने की इजाजत मांगी है। उन्होंने अर्जी पर जल्दी सुनवाई के लिए दो तीन बार कोर्ट से अनुरोध किया था। जिस पर कोर्ट ने उन्हें जल्दी सुनवाई का भरोसा भी दिलाया था।

रामलला की ओर से उनके निकट मित्र ने अपील दाखिल कर रखी है जिसमें कहा गया है कि जब हाईकोर्ट ने यह मान लिया कि मुसलमानों का जमीन पर दावा नहीं बनता और इस बात के साफ साक्ष्य हैं कि पहले वहां उत्तर भारत की नगर प्रकृति का मंदिर था तो फिर जमीन के बंटवारे का आदेश देना ठीक नहीं है। जब एएसआई की खुदाई में साबित हो गया कि वहां पहले मंदिर था तो हाईकोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के इस्माइल फारुखी केस के मुताबिक फैसला करना चाहिए था। यह भी कहा गया है कि जब एक बार जमीन को राम जन्मभूमि घोषित कर दिया गया है तो फिर उसे अंदर का हिस्सा बाहर का हिस्सा या केन्द्रीय गुंबद आदि में बांटना असंगत है। न्यायामूर्ति एसयू खान के फैसले में यह कहना गलत है कि समयसीमा (लिमिटेशन) के मामले में भगवान हमेशा नाबालिग नहीं माने जा सकते। रामलला की अपील में न्यायमूर्ति खान और न्यायमूर्ति अग्रवाल के फैसले को चुनौती दी गयी है क्योंकि तीसरे न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवी शर्मा ने बाकी सारे मुकदमें खारिज करते हुए सिर्फ भगवान राम के हक में फैसला दिया था।

निर्मोही अखाड़े का अपील में कहना है कि जब मुसलमानों का जमीन का वाद खारिज कर दिया है तो उन्हें जमीन का हिस्सा कैसे बांटा जा सकता है। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने अपनी अपील में कहा है। उनका वाद गलत खारिज किया गया है। उनका एडवर्स पजेशन का दावा सही है। हिन्दू महासभा ने भी अपील दाखिल कर रखी है जिसमें कहा गया है कि मुसलमानों को एक तिहाई जमीन देने का हाईकोर्ट का आदेश गलत है। मोहम्मद हाशिम की मृत्यु हो जाने के बाद उनका बेटा इकबाल अहमद पक्षकार बन गया है। उसकी अपील भी लंबित है।

इस विवाद का पूरा घटनाक्रम

1528: अयोध्या में बाबरी मस्जिद के निर्माण का दावा

1853: हिंदुओं का आरोप कि भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ। इस मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई।

1859: ब्रिटिश सरकार ने तारों की एक बाड़ खड़ी की। मुस्लिमों और हिदुओं को अलग-अलग प्रार्थनाओं की इजाजत दी।

1885: मामला पहली बार अदालत में पहुंचा। महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील दायर की।

1949: हिंदुओं ने मस्जिद के भीतर कथित तौर पर भगवान राम की मूर्ति रख दी। इसके बाद उस स्थान पर हिंदू नियमित रूप से पूजा करने लगे। मुसलमानों ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया।

1950: गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद अदालत में अपील दायर की। रामलला की पूजा-अर्चना की विशेष इजाजत मांगी। उन्होंने वहां से मूर्ति हटाने पर न्यायिक रोक की भी मांग की।

1961: उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया।

1984: विश्व हिंदू परिषद ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने और राम जन्मस्थान को स्वतंत्र कराने व एक विशाल मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया। और एक समिति का गठन किया।

1986: फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दी।

1989: तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने बाबरी मस्जिद के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी।

1990: भाजपा अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली।

1990: आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया। बीजेपी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

1991: उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद के आस-पास की 2.77 एकड़ भूमि को अपने अधिकार में ले लिया।

1992: 6 दिसंबर को हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढहा दिया, इस घटना के बाद सांप्रदायिक दंगे हुए। 

1992: मस्जिद की तोड़-फोड़ की जांच के लिए एम.एस. लिब्रहान आयोग का गठन हुआ।

2002: अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की।

2003: इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की। मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिलने का दावा।

2003: अदालत का फैसला, मस्जिद के विध्वंस को उकसाने वाले सात हिंदू नेताओं को सुनवाई के लिए बुलाया जाए।

2004: आडवाणी ने अयोध्या में मंदिर निर्माण की बीजेपी की प्रतिबद्धता दोहराई।

2005: संदिग्ध इस्लामी आतंकवादियों ने विस्फोटकों से भरी एक जीप का इस्तेमाल करते हुए विवादित स्थल पर हमला किया। सुरक्षा बलों ने पांच आतंकवादियों को मार गिराया।

2009: लिब्रहान आयोग ने गठन के 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

2010: सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहबाद उच्च न्यायालय को विवादित मामले में फैसला देने से रोकने वाली याचिका खारिज करते हुए फैसले का मार्ग प्रशस्त किया।

2010: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

2017: राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की पेशकश की है. चीफ जस्टिस जे एस खेहर ने कहा है कि अगर दोनों पक्ष राजी हो तो वो कोर्ट के बाहर मध्यस्थता करने को तैयार हैं.

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