हम आजाद थे ,आजाद हैं ,आजाद रहेंगे

आज महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद की 114वीं जयंती

हम आजाद थे ,आजाद हैं ,आजाद रहेंगे

चंद्रशेखर तिवारी, जिन्हें इसके संस्थापक राम प्रसाद बिस्मिल और तीन अन्य प्रमुख पार्टी नेताओं, रोशन सिंह, राजेंद्र नाथ लाहिरी और अशफाकउल्ला खान की मृत्यु के बाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के नए नाम के तहत चंद्रशेखर आज़ाद के नाम से जाना जाता है।

जन्म: 23जुलाई 1906 भावरा मध्यप्रदेश।मृत्यु: 27 फरवरी 1931, चंद्रशेखर आजाद पार्क, प्रयागराज।पूरा नाम: चंद्रशेखर तिवारी।माता-पिता: जागरानी देवी, सीताराम तिवारी,भाई-बहन: सुखदेव

  आज महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद की 114वीं जयंती है।

 चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को हुआ था। आज उनकी 114वीं जयंती पर उनके द्वारा दिए गए कुछ प्रेरणादायक और प्रसिद्ध उद्धरण हैं जो हममें देशभक्ति की भावना को प्रज्वलित कर सकते हैं।

चंद्रशेखर आजाद उन सबसे उल्लेखनीय भारतीय क्रांतिकारियों में से एक थे जिन्होंने बहुत कम उम्र में भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था। उसकी माँ चाहती थी कि वह पढ़े और संस्कृत का महान विद्वान बने।

13 अप्रैल, 1919 को हुई जलियांवाला बाग की घटना से आजाद बहुत प्रभावित हुए। वह भारतीय स्वतंत्रता के लिए क्रांति में शामिल हुए और जल्द ही 1920 में महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले असहयोग आंदोलन का हिस्सा बन गए। यहां तक ​​कि उन्हें युवावस्था में गिरफ्तार भी कर लिया गया  आंदोलन का हिस्सा बनने के लिए 15 वर्ष की आयु भी  नहीं पार कर पाए थे।

वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के मुख्य रणनीतिकार थे।  उनकी पसंदीदा कविता थी: दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आज़ाद ही रहेंगे, आज़ाद ही रहेंगे!

चंद्र शेखर आजाद 114वीं जयंती: प्रेरणादायक और प्रसिद्ध 4 उद्धरण

 1."यदि फिर भी तेरा लहू नहीं रोता, तो तेरी रगों में बहता हुआ जल है। यदि मातृभूमि की सेवा न हो तो यौवन का क्या रस है।"  -चंद्रशेखर आजाद

 2."जमीन पर एक विमान हमेशा सुरक्षित रहता है, लेकिन यह उसके लिए नहीं बना है। महान ऊंचाइयों को प्राप्त करने के लिए जीवन में हमेशा कुछ सार्थक जोखिम उठाएं।"  - चंद्रशेखर आजाद

 3."दूसरों को अपने से बेहतर करते हुए न देखें, हर रोज अपने खुद के रिकॉर्ड को तोड़ें, क्योंकि सफलता आपके और आपके बीच की लड़ाई है।"  -चंद्रशेखर आजाद

 4."मैं एक ऐसे धर्म में विश्वास करता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का प्रचार करता है।"  -चंद्रशेखर आजाद। चंद्रशेखर आजाद के बारे में कुछ चीन्हे  अचीन्हें तथ्य :

1.उनका असली नाम चंद्रशेखर तिवारी था।  इस बीच, उन्हें दिए गए कुछ अन्य नाम आज़ाद, बराज, पंडित जी थे।

2.वह भाबरा, अलीराजपुर (ब्रिटिश भारत) से था जो अब मध्य प्रदेश में है।

3.15 साल की उम्र में, वह 1920 में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए।

4.1922 में असहयोग आंदोलन के निलंबन के बाद, निराश आजाद राम प्रसाद बिस्मिल द्वारा गठित हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) में शामिल हो गए।5.आज़ाद ने अन्य स्वतंत्रता सेनानियों, राम प्रसाद बिस्मिल अशफाकउल्ला खान, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्र नाथ लाहिरी को काकोरी ट्रेन डकैती मामले में मौत की सजा के बाद संगठन का कार्यभार संभाला।

6.1925 में काकोरी ट्रेन डकैती और 1928 में जॉन सॉन्डर्स की हत्या में भाग लेने के बाद आज़ाद अधिक लोकप्रिय हो गए, जो सहायक पुलिस अधीक्षक थे।

7.उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जिला मजिस्ट्रेट जस्टिस रेवरेंड टॉमसन क्रेगेट के सामने पेश किया गया, जहां उन्होंने अपना नाम आजाद (स्वतंत्र), उनके पिता का नाम स्वतंत्रता (स्वतंत्रता) और उनके निवास स्थान को जेल के रूप में दिया।  सजा के तौर पर उन्हें 15 बार कोड़े मारे गए।

8.आजाद साथी सुखदेव राज के साथ इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में बातचीत कर रहे थे, जहां किसी ने पुलिस के सीआईडी प्रमुख सर जे.आर.एच. नॉट-ब्राउर को पार्क में उनकी मौजूदगी के बारे में बताया।  पुलिस ने उस इलाके को घेर लिया जिसके बीच में आजाद को एक पेड़ के पीछे छिपना पड़ा, लेकिन लंबी गोलीबारी के बाद उसने अपनी आखिरी गोली से खुद को गोली मार ली।उस पार्क की दास्तान जो कहलाता है चंद्रशेखर आजाद पार्क: इसके कई नाम रहे हैैं अतीत में। यह बलिदानी अतीत की थाती भी संवारे हुए है और देश के लिए मर मिटने की प्रेरणा देता है। शहर के हृदय स्थल में फैली हरियाली यदि आंखों को सुकून देती है तो इससे जुड़ा इतिहास हमेशा रोमांचित करता है।गर्व है मुझे अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद पार्क नाम मिलने पर मेरी उम्र करीब 150 साल हो गई है। मेरा फैलाव 133 एकड़ में है। मुझे प्रदेश का सबसे बड़ा पार्क होने का गौरव हासिल है। इससे बड़ा तमगा मुझे तब मिला जब मेरी पहचान अमर शहीद चंद्रेशखर आजाद पार्क के रूप में स्थापित हुई।दुख इस बात का है कि मैंने देश के वीर सपूत 'आजाद की शहादत देखी है। हां, मैं गवाह हूं उस वीर सपूत की दिलेरी का। वह 27 फरवरी 1931 की सुबह थी। साइकिल से चंद्रशेखर आजाद अल्फ्रेड पार्क आए और साथी सुखदेव से गंभीर मंत्रणा कर रहे थे। किसी ने मुखबिरी कर दी। चारों तरफ से गोरों की पुलिस ने घेर लिया। डीवाइएसपी विश्वेश्वर सिंह और तत्कालीन एसएसपी जान नॉट बोवर आ धमके। खतरे को आजाद ने भांप लिया तुरंत मोर्चा संभालते हुए साथी सुखदेव को कवर फायर देकर वहां से निकल जाने के लिए कहा। इसी बीच आजादी के उस दीवाने को पैर में गोली लग गई। सुखदेव जाना नहीं चाहते थे। कहा, ऐसे हाल में वह उन्हें छोड़कर नहीं जाएंगे, लेकिन आजाद ने एक न सुनी। विश्वास दिलाया कि फिरंगियों को झांसा देकर वह निकल आएंगे। सुखदेव वहां से भागकर इंडियन प्रेस पहुंचे। बताया कि पुलिस पीछे लगी है तो प्रेस के लोगों ने उन्हें बैठने के लिए कहा। रजिस्टर में गेट से एंट्री का समय सुबह सात बजे दिखा दिया गया ताकि पुलिस किसी तरह का आरोप न लगा सके। इधर आजाद ने पुलिस से मोर्चा लेने के लिए अपनी पिस्तौल जिसे वह बम्तुल बुखारा कहते थे, का मुंह खोल दिया। निकली गोली ने एसएसपी जान नॉट बोवर की दाहिनी कलाई और डीवाइएसपी विश्वेश्वर सिंह का जबड़ा चीर दिया। तब तक पुलिस ने पूरे पार्क को घेर लिया था, लेकिन वीर सपूत ने हौसला नहीं छोड़ा। जामुन के पेड़ की आड़ लेकर गोली चलाते रहे। अंत में सिर्फ एक गोली बची और उन्हें याद आ गया अपना वह संकल्प और दावा जिसमें कहा था मैं आजाद था, आजाद हूं और आजाद रहूंगा। अंग्रेजों के हाथ नहीं लगूंगा आजाद ही मरूंगा। बस आखिरी गोली अपनी कनपटी पर दाग ली और चिर निद्रा में सो गए। फिरंगियों की पुलिस फिर भी उनके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। मृत शरीर पर गोलियां चलाईं। करीब आधे घंटे बाद पहुंची। यह क्षण मेरे लिए बहुत भारी थे। उसके बाद बहुत लोग जुटे। खैर मैैं अल्फ्रेड पार्क से कंपनी बाग और फिर मोतीलाल नेहरू पार्क होते हुए चंद्रशेखर आजाद पार्क कहलाने लगा।

द्वारा-डॉक्टर रामानुज पाठक

सतना मध्यप्रदेश।

संपर्क 7974246591.